भेड़ की ऊन से बनते हैं पहचान के अनोखे नमूने और परंपरा, मशीन नहीं.. सुनीता दिखा रही हाथों के हुनर की ताकत

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उत्तराखंड की अनोखी हस्तकला. गढ़वाल क्षेत्र से आई यह कला आज भी परंपरा और मेहनत की मिसाल है. आसन, पायदान और गलीचा जैसे उत्पाद, जिन्हें स्थानीय भाषा में धन कहा जाता है, न सिर्फ उपयोगी हैं बल्कि संस्कृति की पहचान भी हैं. दिल्ली की सुनीता पिछले 35 वर्षों से इस कला को सिर्फ अपने हाथों की कारीगरी और वर्षों के अनुभव से अकेले ही संवार रही हैं. एक साधारण दरी बनाने में एक महीना और बड़े गलीचों में 3-4 महीने लगते हैं.   Read More ...

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